कुछ लफ़्ज़ों से कह पाऊँ कुछ आँखों से जता पाऊँ ख्याल बस इतना सा है मोहब्बत से ज़िन्दगी जी पाऊँ
Saturday, 29 October 2016
Tuesday, 6 September 2016
तेरे इश्क़ में जो भी डूब गया ...उसे दुनिया की लहरों से डरना क्या...
सूफी संगीत एक रूहानी रिश्ता कायम करता है खुदा की इबादत का एक अनोखा और खूबसूरत रास्ता जो रूह से गुज़रकर खुदा तक जाता है ।इस अनोखे एहसास का अपना अलग ही मज़ा है ।एक अलग ही माहोल बनता है और गाने वाले सुनने वाले सब उस दरिया में डूब जाते है । जंहा इस दुनिया का ध्यान ही नहीं रहता ।ऐसा ही सूफी का रंग चढ़ जाता है जब में अब्दुल्ला कुरैशी के गाये "तेरे इश्क़ में जो भी डूब गया ।उसे दुनिया की लहरों से डरना क्या" सूफी कलाम को सुनता हूँ । वैसे इसका ऑरिजनल वर्जन अलां फकीर और मोहम्मद अली शेखी ने गाया है । जो सिंधी और पंजाबी में है । पाकिस्तान के टीवी शो नेसकैफे बेसमेंट सीजन 2 में भी इसे गाया गया है । लेकिन अब्दुल्ला कुरैशी की लाइव परफॉरमेंस मैं गाया यह सूफी कलाम एक अलग ही सुकून देता है । शायद इसलिए भी की मैंने पहले इसी को सुना वो भी कई दफा । अब्दुल्ला पाक्सितान के इस्लामाबाद से है ।और लाइव शो करते है।
हो ! इस इश्क़ दी जंगी विच मोर बुलेंदा
सानु किबला तों क़ाबा सोणा यार डिसेंदा
देखूँ जब में जमी देखूँ ये आसमान
सब तेरे है निशान ,सब तेरे है निशान
Wednesday, 27 July 2016
दो साये.....
वक़्त भी आखिर वक़्त है न जाने क्यू यूँ तन्हा गुज़रता नहीं
दो साये अब भी उस पुरानी हवेली में दिखाई देते है
कभी मिलकर बतियाया करते है
तो कभी दीवारों से गुफ़्तगू हुआ करती है उनकी
Thursday, 14 July 2016
फिर छिड़ी रात बात......सोनू निगम और तलत अज़ीज़
बारिश के मौसम में ग़ज़ल सुनना यानी ख़ुशी दोगुनी और दो बेहतरीन गायको को एक साथ सोनू निगम और तलत अज़ीज़
दोनों की जुगलबंदी इस ग़ज़ल में वाकई बहुत उम्दा है
तलत अज़ीज़ को साल भर पहले सुना था ।ग़ज़ल थी "अब क्या ग़ज़ल सुनाऊ तुझे देखने के बाद "
तब पता नहीं था ।की ग़ज़ल गायी किसने है
"फिर छिड़ी रात बात फुलों की
रात है या बारात फूलों की
फूल के हार,फूल के गजरे
शाम फूलों की,रात फूलों की
आप का साथ,साथ फूलों का
आप की बात ,बात फूलों की
फूल खिलते रहेँगे दुनिया में
रोज़ निकलेगी बात फूलों की
नज़रें मिलती है जाम मिलते है
मिल रही है हयात फूलों की
ये महकती हुई ग़ज़ल मखदूम
जैसे सेहरा में रात फूलों की
दोनों की जुगलबंदी इस ग़ज़ल में वाकई बहुत उम्दा है
तलत अज़ीज़ को साल भर पहले सुना था ।ग़ज़ल थी "अब क्या ग़ज़ल सुनाऊ तुझे देखने के बाद "
तब पता नहीं था ।की ग़ज़ल गायी किसने है
"फिर छिड़ी रात बात फुलों की
रात है या बारात फूलों की
फूल के हार,फूल के गजरे
शाम फूलों की,रात फूलों की
आप का साथ,साथ फूलों का
आप की बात ,बात फूलों की
फूल खिलते रहेँगे दुनिया में
रोज़ निकलेगी बात फूलों की
नज़रें मिलती है जाम मिलते है
मिल रही है हयात फूलों की
ये महकती हुई ग़ज़ल मखदूम
जैसे सेहरा में रात फूलों की
Tuesday, 5 July 2016
Subscribe to:
Posts (Atom)

एक साया